Shri Durga Chalisa : श्री दुर्गा चालीसा



नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥

निराकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूं लोक फैली उजियारी 



Maa Durga Aarti : दुर्गा माँ आरती


ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥

 


जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ जय अम्बे गौरी ॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्जवल से दो‌उ नैना, चन्द्रबदन नीको ॥ जय अम्बे गौरी ॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै । रक्त पुष्प गलमाला, कण्ठन पर साजै ॥ जय अम्बे गौरी ॥

केहरि वाहन राजत, खड़ग खप्परधारी । सुर नर मुनिजन सेवक, तिनके दुखहारी ॥ जय अम्बे गौरी ॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति ॥ जय अम्बे गौरी ॥

शुम्भ निशुम्भ विडारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ जय अम्बे गौरी ॥

चण्ड मुण्ड संघारे, शोणित बीज हरे । मधुकैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे ॥ जय अम्बे गौरी ॥

ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ जय अम्बे गौरी ॥

चौसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरुं । बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु ॥ जय अम्बे गौरी ॥

तुम हो जग की माता, तुम ही हो भर्ता । भक्‍तन् की दुःख हरता, सुख-सम्पत्ति करता ॥ जय अम्बे गौरी ॥

भुजा चार अति शोभित, खड़ग खप्परधारी । मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ जय अम्बे गौरी ॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती । श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति ॥ जय अम्बे गौरी ॥

श्री अम्बे जी की आरती, जो को‌ई नर गावै ।

कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै ॥ जय अम्बे गौरी ॥

हनुमान जी की पूजा-अर्चना करे, तो इन ग्रहों से मिलेगा शुभ फल


हनुमानजी की पूजा से सभी प्रकार का सुख प्राप्त होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि कुंडली में स्थित ग्रहों के कारण अशुभ फल प्राप्त हो रहे हैं तो इसके लिए भी हनुमानजी की पूजा करना शुभ रहता है।

                                          

हनुमान जयंती (25 अप्रैल, गुरुवार) के शुभ अवसर पर जानिए हनुमानजी की पूजा करने से किन-किन ग्रहों के दोष से मुक्ति मिलती है-

सूर्य: हनुमानजी के गुरु सूर्य देव हैं। उन्होंने सूर्य देवता से ही शिक्षा ग्रहण की थी। सूर्य देव के मित्र चंद्र, मंगल, बुध व गुरु हैं। ऐसे में हनुमत उपासना से सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध व गुरु ग्रहों की पीड़ा से भी मुक्ति मिलती है।हनुमानजी के जन्म के समय भी सूर्य उच्च राशि मेष में थे।

शनि: सूर्य के पुत्र हैं शनि। शनिदेव ने अहंकारवश हनुमानजी को युद्ध के लिए बाध्य किया था। हनुमानजी ने अपनी पूंछ में बांधकर शनि को संपूर्ण रामसेतु की परिक्रमा करा दी थी। शनि का शरीर रक्त रंजित हो गया था।
विनती करने पर हनुमानजी ने शनि को इस शर्त पर छोड़ा कि मेरी आराधना करने वाले भक्तों को आप कष्ट नहीं देंगे। रक्त रंजित शरीर पर शनि ने तेल लगाकर शांति पाई। इसीलिए आज भी शनि से पीडि़त लोग उन्हें तेल अर्पण करते हैं।

राहु-केतु: दोनों छाया ग्रह क्रूर हैं। हनुमानजी के डर से राहु भागकर इंद्रदेव के पास चला गया था। हनुमानजी की भक्ति करने से राहु-केतु जनित कष्टों से मुक्ति मिलती है।

शुक्र : हनुमानजी महान संगीतज्ञ, शृंगार प्रिय और विनोदी हैं। अत: उनका शृंगार करने और संगीतमयी गुणगान करने से वे जल्द प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार हनुमानजी की उपासना करने से नवग्रह की उपासना भी हो जाती है। समस्त ग्रह जन्य दोष स्वत: समाप्त हो जाते हैं। 


Maa Vaishnodevi : माँ वैष्णो देवी का इतिहास


शक्ति को समर्पित एक पवित्रतम हिंदू मंदिर है, जो भारत के जम्मू और कश्मीर में वैष्णो देवी की पहाड़ी पर स्थित है। हिंदू धर्म में वैष्णो देवी , जो माता रानी और वैष्णवी के रूप में भी जानी जाती हैं, देवी मां का अवतार हैं।
हिंदू महाकाव्य के अनुसार, मां वैष्णो देवी ने भारत के दक्षिण में रत्‍‌नाकर सागर के घर जन्म लिया। उनके लौकिक माता-पिता लंबे समय तक नि:संतान थे। दैवी बालिका के जन्म से एक रात पहले, रत्‍‌नाकर ने वचन लिया कि बालिका जो भी चाहे, वे उसकी इच्छा के रास्ते में कभी नहीं आएंगे. मां वैष्णो देवी को बचपन में त्रिकुटा नाम से बुलाया जाता था। बाद में भगवान विष्णु के वंश से जन्म लेने के कारण वे वैष्णवी कहलाईं।
जब त्रिकुटा 9 साल की थीं, तब उन्होंने अपने पिता से समुद्र के किनारे पर तपस्या करने की अनुमति चाही। त्रिकुटा ने राम के रूप में भगवान विष्णु से प्रार्थना की। सीता की खोज करते समय श्री राम अपनी सेना के साथ समुद्र के किनारे पहुंचे। उनकी दृष्टि गहरे ध्यान में लीन इस दिव्य बालिका पर पड़ी। त्रिकुटा ने श्री राम से कहा कि उसने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया है। श्री राम ने उसे बताया कि उन्होंने इस अवतार में केवल सीता के प्रति निष्ठावान रहने का वचन लिया है। लेकिन भगवान ने उसे आश्वासन दिया कि कलियुग में वे कल्कि के रूप में प्रकट होंगे और उससे विवाह करेंगे।
इस बीच, श्री राम ने त्रिकुटा से उत्तर भारत में स्थित माणिक पहाडि़यों की त्रिकुटा श्रृंखला में अवस्थित गुफा में ध्यान में लीन रहने के लिए कहा। रावण के विरुद्ध श्री राम की विजय के लिए मां ने नवरात्र मनाने का निर्णय लिया। इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी। त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी।

Shivkuti : शिव कचेहरी मंदिर, शिवकुटी


प्रयाग की धरती पर स्थित प्रत्येक देवालय की अपनी विशेषता है और इसी श्रृंखला का मंदिर है शिवकुटी महादेव मंदिर के समीप का शिव कचेहरी मंदिर। मंदिर में विभिन्न आकार प्रकार के 206 शिवलिंग स्थापित हैं। और इसी कारण मंदिर का नाम भी शिव कचेहरी पड़ गया। लिंगों में एक ऐसा भी अद्भूत, आश्चर्यजनक व चमत्कारिक विग्रह है जो वर्ष में दो से तीन बार अपना रंग बदलता है। विग्रहों के रंग भी अलग अलग हैं। महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है।

शिव कचहेरी मंदिर की पहचान बगल के मंदिर शिवकुटी व श्री सत्यनारायण मंदिर से सुलभता से होती है। यहां तक पहुंचने के लिए इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से गोविंदपुर-अपट्रान चौराहा मार्ग की टेंपो पकड़नी होगी। चौराहे पर उतर कर चंद कदम दूर स्थित मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। इस मंदिर को टूर एंड ट्रैवेल्स के पैकेजों में स्थान नहीं मिला हुआ है।
मंदिर का कोई पौराणिक माहात्म्य तो नहीं मिलता लेकिन सर्वविदित तथ्य है कि सन 1825 में नेपाल से आए राजा राना जंग बहादुर ने मंदिर की स्थापना की। उनकी 306 रानियां थी और प्रत्येक रानी ने एक एक शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की। कालांतर में तमाम विग्रह इधर-उधर हो गए। वर्तमान समय में 280 शिवलिंग अवस्थित हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका बाहरी रंग हल्का हार प्रतीत होता है। कुछ पर चंद्राकार तथा कुछ पर नागराज का निशान बना हुआ है। दुर्भाग्य यह कि इस मंदिर की उपेक्षा के चलते इसकी तस्वीर खराब होती जा रही है हालांकि प्रत्येक शिव तिथि पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

Shri Hanuman ji Temple : श्री हनुमान मंदिर, हाईकोर्ट


श्री हनुमान मंदिरों के क्रम में हाईकोर्ट के पास श्री हनुमान मंदिर का भी अपना विशेष स्थान है। उक्त मंदिर में श्री हनुमानजी विप्र रूप में विराजमान हैं। यह अभय या आशीर्वाद मुद्रा की प्रतिमा प्रतीत होती है। चूंकि यह प्रतिमा संगमरमर की है, अत: इसमें सिंदूर लेपन नहीं होता जैसा कि अन्य पाषाण हनुमत् प्रतिमाओं में होता है। संकटमोचक की मनोहारी भाव भंगिमा का आध्यात्मिक प्रभाव भक्तों के अन्तर्मन में चस्पा रहता है।
इस मंदिर में पहले श्री दुर्गा जी की प्रतिमा स्थापित थी, जिसकी मान्यता जागृत प्रतिमा के रूप में है। जयपुर से मंगाई गयी देवी की इस प्रतिमा के स्वरूप में अद्भुत सम्मोहन है। लगभग तीन दशक पूर्व वैदिक रीति से इस देवी प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। दुर्गा जी के बगल ही राधाकृष्ण की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। उनके बगल श्री गणेश जी की मूर्ति विराजमान है। उनके बगल मध्य में संकटमोचन श्री हनुमान जी की मूर्ति अभय मुद्रा में विराजमान है। उनके बगल श्रीराम, लक्ष्मण, जानकी की आकर्षक मूर्तियां प्रतिष्ठापित हैं।
मंदिर तक पहुंचना बेहद ही सरल है। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन हो या फिर सिविल लाइन बस स्टेशन, हर स्थान से टेंपो व रिक्शा सुविधा मिल जाएगी। हाइकोर्ट के लिए इन साधनों का इस्तमाल कर पहुंचिए वहां किसी भी स्थानीय व्यक्ति से पूछ लीजिए, मंदिर का पता लग जाएगा। इस मंदिर में प्रत्येक पर्व तिथि पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है।

Shri Mehndipur Balaji : मेहंदीपुर, श्री बालाजी महाराज


गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा था जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मेरी कोई शक्ति इस धरा धाम पर अवतार लेकर भक्तों के दु:ख दूर करती है और धर्म की स्थापना करती है। अंजनी कुमार श्री बाला जी घाटा मेहंदीपुर में प्रादुर्भाव इसी उद्देश्य से हुआ है। घाटा मेहंदीपुर में भगवान महावीर बजरंगबली का प्रादुर्भाव वास्तव में इस युग का चमत्कार है। राजस्थान राज्य के दो जिलों सवाईमाधोपुर व दौसा में विभक्त घाटा मेहंदीपुर स्थान बड़ी लाइन बांदी कुई स्टेशन से जो कि दिल्ली, जयपुर, अजमेर अहमदाबाद लाइन पर 24 मील की दूरी पर स्थित है। अब तो हिण्डौन आगरा, कानपुर, मथुरा, वृंदावन,दिल्ली जयपुर, अजमेर अहमदाबाद लाइन पर 24 मील की दूरी पर स्थित है। अब तो हिण्डौन आगरा, कानपुर, मथुरा, वृन्दावन, दिल्ली आदि से जयपुर जाने वाली सभी बसें बालाजी मोड़ पर रुकती है। यहां तीनों देवों की प्रधानता है।

श्री बालाजी महाराज श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल (भैरव) यह तीन देव यहां आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे। इनके प्रकट होने से लेकर अब तक बारह महंत इस स्थान पर सेवा पूजा कर चुके हैं जिनमें अब तक इस स्थान के दो महंत इस समय भी विद्यमान हैं। किसी शासक ने श्री बाला जी महाराज की मूर्ति को खोदने का प्रयत्‍‌न किया, सैकड़ों हाथ खोद देने के बाद भी जब मूर्ति के चरणों का अंत नहीं पाया तो वह हार मानकर चला गया। वास्तव में इस मूर्ति को अलग से किसी कलाकार ने गढ़कर नहीं बनाया है, अपितु यह तो पर्वत का ही अंग है।
यह समूचा पर्वत ही मानो उनका कनक मूधराकार शरीर है। इस मूर्ति के चरणों में एक छोटी सी कुडी थी जिसका जल कभी भी खत्म नहीं होता था, यह रहस्य है कि महाराज की बायीं छाती के नीचे एक बारीक जल धारा बहती रहती है, जो पर्याप्त चोला चढ़ जाने के बाद भी बन्द नहीं होती है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मूर्ति के अतिरिक्त किसी व्यक्ति विशेष का कोई चमत्कार नहीं है। यहां प्रमुख है सेवा और भक्ति।

Thirupati balaji : तिरूपति-बालाजी



वैंकटेश भगवान को कलियुग में बालाजी नाम से भी जाना गया है। पौराणिक गाथाओं और परम्पराओं से जु़डा संक्षिप्त इतिहास यहां प्रस्तुत है-
प्रसिद्ध पौराणिक सागर-मंथन की गाथा के अनुसार जब सागर मंथन किया गया था तब कालकूट विष के अलावा चौदह रत्‍‌न निकले थे। इन रत्‍‌नों में से एक देवी लक्ष्मी भी थीं। लक्ष्मी के भव्य रूप और आकर्षण के फलस्वरूप सारे देवता, दैत्य और मनुष्य उनसे विवाह करने हेतु लालायित थे, किन्तु देवी लक्ष्मी को उन सबमें कोई न कोई कमी लगी। अत: उन्होंने समीप निरपेक्ष भाव से खड़े हुए विष्णुजी के गले में वरमाला पहना दी। विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को अपने वक्ष पर स्थान दिया।
यह रहस्यपूर्ण है कि विष्णुजी ने लक्ष्मीजी को अपने ह्वदय में स्थान क्यों नहीं दिया? महादेव शिवजी की जिस प्रकार पत्‍‌नी अथवा अर्धाग्नि पार्वती हैं, किन्तु उन्होंने अपने ह्वदयरूपी मानसरोवर में राजहंस राम को बसा रखा था उसी समानांतर आधार पर विष्णु के ह्वदय में संसार के पालन हेतु उत्तरदायित्व छिपा था। उस उत्तरदायित्व में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं हो इसलिए संभवतया लक्ष्मीजी का निवास वक्षस्थल बना।
एक बार धरती पर विश्व कल्याण हेतु यज्ञ का आयोजन किया गया। तब समस्या उठी कि यज्ञ का फल ब्रम्हा, विष्णु, महेश में से किसे अर्पित किया जाए। इनमें से सर्वाधिक उपयुक्त का चयन करने हेतु ऋषि भृगु को नियुक्त किया गया। भृगु ऋषि पहले ब्रम्हाजी और तत्पश्चात महेश के पास पहुंचे किन्तु उन्हें यज्ञ फल हेतु अनुपयुक्त पाया। अंत में वे विष्णुलोक पहुंचे। विष्णुजी शेष शय्या पर लेटे हुए थे और उनकी दृष्टि भृगु पर नहीं जा पाई। भृगु ऋषि ने आवेश में आकर विष्णु जी के वक्ष पर ठोकर मार दी। अपेक्षा के विपरीत विष्णु जी ने अत्यंत विनम्र होकर उनका पांव पक़ड लिया और नम्र वचन बोले- हे ऋषिवर! आपके कोमल पांव में चोट तो नहीं आई? विष्णुजी के व्यवहार से प्रसन्न भृगु ऋषि ने यज्ञफल का सर्वाधिक उपयुक्त पात्र विष्णुजी को घोषित किया। उस घटना की साक्षी विष्णुजी की पत्‍‌नी लक्ष्मीजी अत्यंत क्रुद्व हो गई कि विष्णुजी का वक्ष स्थान तो उनका निवास स्थान है और वहां धरतीवासी भृगु को ठोकर लगाने का किसने अधिकार दिया? उन्हें विष्णुजी पर भी क्रोध आया कि उन्होंने भृगु को दंडित करने की अपेक्षा उनसे उल्टी क्षमा क्यों मांगी? परिणामस्वरूप लक्ष्मीजी विष्णुजी को त्याग कर चली गई। विष्णुजी ने उन्हें बहुत ढूंढा किन्तु वे नहीं मिलीं।
अंतत: विष्णुजी ने लक्ष्मी को ढूंढते हुए धरती पर श्रीनिवास के नाम से जन्म लिया और संयोग से लक्ष्मी ने भी पद्मावती के रूप में जन्म लिया। घटनाचक्र ने उन दोनों का अंतत: परस्पर विवाह करवा दिया। सब देवताओं ने इस विवाह में भाग लिया और भृगु ऋषि ने आकर एक ओर लक्ष्मीजी से क्षमा मांगी तो साथ ही उन दोनों को आशीर्वाद प्रदान किया।
लक्ष्मीजी ने भृगु ऋषि को क्षमा कर दिया किन्तु इस विवाह के अवसर पर एक अनहोनी घटना हुई। विवाह के उपलक्ष्य में लक्ष्मीजी को भेंट करने हेतु विष्णुजी ने कुबेर से धन उधार लिया जिसे वे कलियुग के समापन तक ब्याज सहित चुका देंगे। ऐसी मानता है कि जब भी कोई भक्त तिरूपति बालाजी के दर्शनार्थ जाकर कुछ चढ़ाता है तो वह न केवल अपनी श्रद्धा भक्ति अथवा आर्त प्रार्थना प्रस्तुत करता है अपितु भगवान विष्णु के ऊपर कुबेर के ऋण को चुकाने में सहायता भी करता है। अत: विष्णुजी अपने ऐसे भक्त को खाली हाथ वापस नहीं जाने देते हैं।
जिस नगर में यह मंदिर बना है उसका नाम तिरूपति है और नगर की जिस पहाड़ी पर मंदिर बना है उसे तिरूमला (श्री+मलय) कहते हैं। तिरूमला को वैंकट पहाड़ी अथवा शेषांचलम भी कहा जाता है। यह पहड़ी सर्पाकार प्रतीत होती हैं जिसके सात चोटियां हैं जो आदि शेष के फनों की प्रतीक मानी जाती हैं। इन सात चोटियों के नाम क्रमश: शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरू़डाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि और वैंकटाद्रि हैं।

Maa Bhanbhori : माँ बनभौरी देवी, बरवाला (हिसार)


ऐतिहासिक शक्तिपीठ माता बनभौरी धाम में माता भ्रामरी देवी सच्चे मन से मांगी गई हर श्रद्धालु की मन्नत पूरी करती है। बनभौरी धाम में भक्तजन मन्नतों का धागा बांध कर मुरादें मांगते हैं तथा उनके पूरा होने पर फिर सिर झुकाने व दरबार में हाजिरी लगाने मां के चरणों में आते हैं।

नवरात्रों के पावन पर्व पर इन दिनों बनभौरी धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ है। दूर-दूर से श्रद्धालु यहां भंडारा लगाने आते हैं। गठजोड़े की धोक के अलावा मुंडन संस्कार भी अपने बच्चों का श्रद्धालु यहां कराते हैं। बनभौरी धाम में मेले के मद्देनजर सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए गए हैं। पुलिस की विशेष ड्यूटी के अलावा सेवादार भी दिन राज जुटे हैं। सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। बरवाला से बनभौरी धाम तक सड़क की मरम्मत व पुननिर्माण का कार्य पूरा होने से अब श्रद्धालुओं को काफी राहत मिली है। ऐतिहासिक बनभौरी धाम पर मुख्य पुजारी राम निवास कौशिक, सुरेंद्र कौशिक, राजेश कौशिक की देखरेख में लोग दरबार में पूजा-अर्चना करते हैं। वहीं सेवादार मंच के दिलबाग, ईश्वर रामदिया आदि सेवा कार्य में जुटे हैं।

Raghunath Temple : रघुनाथ मंदिर, जम्मू

जम्मू के रघुनाथ मंदिर को उत्तर भारत के सबसे बड़े मंदिर परिसरों में से एक माना जाता है। हालांकि इस मंदिर में कई देवी-देवताओं की पूजा होती है, लेकिन राम यहां के अधिष्ठाता देव हैं।
राम को ही रघुनाथ कहा जाता है और इसलिए इसे रघुनाथ मंदिर। 1835 से 1860 के दौरान जम्मू के महाराजा गुलाब सिंह और उनके बेटे महाराजा रणबीर सिंह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर आकर्षक कलात्मकता का विशिष्ट उदाहरण है।




 मंदिर के भीतर की दीवारों पर तीन तरफ से सोने की परत चढ़ी हुई है। इसके अलावा मुख्य मंदिर के चारों ओर कई मंदिर स्थित हैं, जिनका संबंध रामायण काल के देवी-देवताओं से है। इस मंदिर में सात ऐतिहासिक धार्मिक स्थल मौजूद है। रघुनाथ मंदिर में की गई नक्काशी भी मंत्रमुग्ध कर देने वाली है। पुराने जम्मू शहर के ठीक बीच में स्थित इस मंदिर के सामने वाले बाजार को मंदिर के नाम पर ही रघुनाथ बाजार कहा जाता है। मंदिर के लिए रास्ता रेजीडेंसी रोड से होकर जाता है। जम्मू जाने वाले लोग श्रद्धा के साथ राम को पूजने वहां जाते हैं।

Kalkaji : कालकाजी मंदिर, दिल्ली


अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत पर विराजमान कालकाजी मंदिर के नाम से विख्यात 'कालिका मंदिर' देश के प्राचीनतम सिद्धपीठों में से एक है। जहां नवरात्र में हजारों लोग माता का दर्शन करने पहुंचते हैं।
इस पीठ का अस्तित्व अनादि काल से है। माना जाता है कि हर काल में इसका स्वरूप बदला। मान्यता है कि इसी जगह आद्यशक्ति माता भगवती 'महाकाली' के रूप में प्रकट हुई और असुरों का संहार किया। तब से यह मनोकामना सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है। मौजूदा मंदिर बाबा बालक नाथ ने स्थापित किया। उनके कहने पर मुगल सम्राज्य के कल्पित सरदार अकबर शाह ने इसका जीर्णोद्धार कराया।

                                         

मंदिर के महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत ने बताया कि असुरों द्वारा सताए जाने पर देवताओं ने इसी जगह शिवा (शक्ति) की अराधना की। देवताओं के वरदान मांगने पर मां पार्वती ने कौशिकी देवी को प्रकट किया। जिन्होंने अनेक असुरों का संहार किया लेकिन रक्तबीज को नहीं मार सकीं। तब पार्वती ने अपनी भृकुटी से महाकाली को प्रकट किया। जिन्होंने रक्तबीज का संहार किया। महाकाली का रूप देखकर सभी भयभीत हो गए। देवताओं ने काली की स्तुति की तो मां भगवती ने कहा कि जो भी इस स्थान पर श्रृद्धाभाव से पूजा करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।

माना जाता है कि महाभारत काल में युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ यहां भगवती की अराधना की। बाद में बाबा बालकनाथ ने इस पर्वत पर तपस्या की। तब माता भगवती से उनका साक्षात्कार हुआ।


मंदिर की विशेषता

मुख्य मंदिर में 12 द्वार हैं, जो 12 महीनों का संकेत देते हैं। हर द्वार के पास माता के अलग-अलग रूपों का चित्रण किया गया है। मंदिर के परिक्रमा में 36 मातृकाओं (हिन्दी वर्णमाला के अक्षर) के द्योतक हैं। माना जाता है कि ग्रहण में सभी ग्रह इनके अधीन होते हैं। इसलिए दुनिया भर के मंदिर ग्रहण के वक्त बंद होते हैं, जबकि कालका मंदिर खुला होता है।

नवरात्र मेले में घूमती है माता

आम दिनों में इस मंदिर में वेदोक्त, पुराणोक्त व तंत्रोक्त तीनों विधियों से पूजा होती है। नवरात्र में यहां मेला लगता है। रोजाना हजारों लोग माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मंदिर में अखंड दीप प्रज्जवलित है। पहली नवरात्र के दिन लोग मंदिर से माता की जोत अपने घर ले जाते हैं। नवरात्र में रात 2:30 बजे सुबह की व शाम की आरती सात बजे होती है। मान्यता है कि अष्टमी व नवमी को माता मेला में घूमती हैं। इसलिए अष्टमी के दिन सुबह की आरती के बाद कपाट खोल दिया जाता है। दो दिन आरती नहीं होती। दसवीं को आरती होती है।

कैसे जाएं मंदिर तक

माता के दर्शन करने के लिए मेट्रो से कालकाजी मंदिर मेट्रो स्टेशन उतरकर लोग आसानी से पहुंच सकते हैं। जो बदरपुर मेट्रो लाइन पर स्थित है।

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