Shivkuti : शिव कचेहरी मंदिर, शिवकुटी
प्रयाग की धरती पर स्थित प्रत्येक देवालय की अपनी विशेषता है और इसी श्रृंखला का मंदिर है शिवकुटी महादेव मंदिर के समीप का शिव कचेहरी मंदिर। मंदिर में विभिन्न आकार प्रकार के 206 शिवलिंग स्थापित हैं। और इसी कारण मंदिर का नाम भी शिव कचेहरी पड़ गया। लिंगों में एक ऐसा भी अद्भूत, आश्चर्यजनक व चमत्कारिक विग्रह है जो वर्ष में दो से तीन बार अपना रंग बदलता है। विग्रहों के रंग भी अलग अलग हैं। महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है।
शिव कचहेरी मंदिर की पहचान बगल के मंदिर शिवकुटी व श्री सत्यनारायण मंदिर से सुलभता से होती है। यहां तक पहुंचने के लिए इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से गोविंदपुर-अपट्रान चौराहा मार्ग की टेंपो पकड़नी होगी। चौराहे पर उतर कर चंद कदम दूर स्थित मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। इस मंदिर को टूर एंड ट्रैवेल्स के पैकेजों में स्थान नहीं मिला हुआ है।
मंदिर का कोई पौराणिक माहात्म्य तो नहीं मिलता लेकिन सर्वविदित तथ्य है कि सन 1825 में नेपाल से आए राजा राना जंग बहादुर ने मंदिर की स्थापना की। उनकी 306 रानियां थी और प्रत्येक रानी ने एक एक शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की। कालांतर में तमाम विग्रह इधर-उधर हो गए। वर्तमान समय में 280 शिवलिंग अवस्थित हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका बाहरी रंग हल्का हार प्रतीत होता है। कुछ पर चंद्राकार तथा कुछ पर नागराज का निशान बना हुआ है। दुर्भाग्य यह कि इस मंदिर की उपेक्षा के चलते इसकी तस्वीर खराब होती जा रही है हालांकि प्रत्येक शिव तिथि पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
Shri Hanuman ji Temple : श्री हनुमान मंदिर, हाईकोर्ट
श्री हनुमान मंदिरों के क्रम में हाईकोर्ट के पास श्री हनुमान मंदिर का भी अपना विशेष स्थान है। उक्त मंदिर में श्री हनुमानजी विप्र रूप में विराजमान हैं। यह अभय या आशीर्वाद मुद्रा की प्रतिमा प्रतीत होती है। चूंकि यह प्रतिमा संगमरमर की है, अत: इसमें सिंदूर लेपन नहीं होता जैसा कि अन्य पाषाण हनुमत् प्रतिमाओं में होता है। संकटमोचक की मनोहारी भाव भंगिमा का आध्यात्मिक प्रभाव भक्तों के अन्तर्मन में चस्पा रहता है।
इस मंदिर में पहले श्री दुर्गा जी की प्रतिमा स्थापित थी, जिसकी मान्यता जागृत प्रतिमा के रूप में है। जयपुर से मंगाई गयी देवी की इस प्रतिमा के स्वरूप में अद्भुत सम्मोहन है। लगभग तीन दशक पूर्व वैदिक रीति से इस देवी प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। दुर्गा जी के बगल ही राधाकृष्ण की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। उनके बगल श्री गणेश जी की मूर्ति विराजमान है। उनके बगल मध्य में संकटमोचन श्री हनुमान जी की मूर्ति अभय मुद्रा में विराजमान है। उनके बगल श्रीराम, लक्ष्मण, जानकी की आकर्षक मूर्तियां प्रतिष्ठापित हैं।
मंदिर तक पहुंचना बेहद ही सरल है। इलाहाबाद रेलवे स्टेशन हो या फिर सिविल लाइन बस स्टेशन, हर स्थान से टेंपो व रिक्शा सुविधा मिल जाएगी। हाइकोर्ट के लिए इन साधनों का इस्तमाल कर पहुंचिए वहां किसी भी स्थानीय व्यक्ति से पूछ लीजिए, मंदिर का पता लग जाएगा। इस मंदिर में प्रत्येक पर्व तिथि पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है।
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Shri Mehndipur Balaji : मेहंदीपुर, श्री बालाजी महाराज
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा था जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब मेरी कोई शक्ति इस धरा धाम पर अवतार लेकर भक्तों के दु:ख दूर करती है और धर्म की स्थापना करती है। अंजनी कुमार श्री बाला जी घाटा मेहंदीपुर में प्रादुर्भाव इसी उद्देश्य से हुआ है। घाटा मेहंदीपुर में भगवान महावीर बजरंगबली का प्रादुर्भाव वास्तव में इस युग का चमत्कार है। राजस्थान राज्य के दो जिलों सवाईमाधोपुर व दौसा में विभक्त घाटा मेहंदीपुर स्थान बड़ी लाइन बांदी कुई स्टेशन से जो कि दिल्ली, जयपुर, अजमेर अहमदाबाद लाइन पर 24 मील की दूरी पर स्थित है। अब तो हिण्डौन आगरा, कानपुर, मथुरा, वृंदावन,दिल्ली जयपुर, अजमेर अहमदाबाद लाइन पर 24 मील की दूरी पर स्थित है। अब तो हिण्डौन आगरा, कानपुर, मथुरा, वृन्दावन, दिल्ली आदि से जयपुर जाने वाली सभी बसें बालाजी मोड़ पर रुकती है। यहां तीनों देवों की प्रधानता है।
श्री बालाजी महाराज श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल (भैरव) यह तीन देव यहां आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे। इनके प्रकट होने से लेकर अब तक बारह महंत इस स्थान पर सेवा पूजा कर चुके हैं जिनमें अब तक इस स्थान के दो महंत इस समय भी विद्यमान हैं। किसी शासक ने श्री बाला जी महाराज की मूर्ति को खोदने का प्रयत्न किया, सैकड़ों हाथ खोद देने के बाद भी जब मूर्ति के चरणों का अंत नहीं पाया तो वह हार मानकर चला गया। वास्तव में इस मूर्ति को अलग से किसी कलाकार ने गढ़कर नहीं बनाया है, अपितु यह तो पर्वत का ही अंग है।
यह समूचा पर्वत ही मानो उनका कनक मूधराकार शरीर है। इस मूर्ति के चरणों में एक छोटी सी कुडी थी जिसका जल कभी भी खत्म नहीं होता था, यह रहस्य है कि महाराज की बायीं छाती के नीचे एक बारीक जल धारा बहती रहती है, जो पर्याप्त चोला चढ़ जाने के बाद भी बन्द नहीं होती है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मूर्ति के अतिरिक्त किसी व्यक्ति विशेष का कोई चमत्कार नहीं है। यहां प्रमुख है सेवा और भक्ति।
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Thirupati balaji : तिरूपति-बालाजी
वैंकटेश भगवान को कलियुग में बालाजी नाम से भी जाना गया है। पौराणिक गाथाओं और परम्पराओं से जु़डा संक्षिप्त इतिहास यहां प्रस्तुत है-
प्रसिद्ध पौराणिक सागर-मंथन की गाथा के अनुसार जब सागर मंथन किया गया था तब कालकूट विष के अलावा चौदह रत्न निकले थे। इन रत्नों में से एक देवी लक्ष्मी भी थीं। लक्ष्मी के भव्य रूप और आकर्षण के फलस्वरूप सारे देवता, दैत्य और मनुष्य उनसे विवाह करने हेतु लालायित थे, किन्तु देवी लक्ष्मी को उन सबमें कोई न कोई कमी लगी। अत: उन्होंने समीप निरपेक्ष भाव से खड़े हुए विष्णुजी के गले में वरमाला पहना दी। विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को अपने वक्ष पर स्थान दिया।
यह रहस्यपूर्ण है कि विष्णुजी ने लक्ष्मीजी को अपने ह्वदय में स्थान क्यों नहीं दिया? महादेव शिवजी की जिस प्रकार पत्नी अथवा अर्धाग्नि पार्वती हैं, किन्तु उन्होंने अपने ह्वदयरूपी मानसरोवर में राजहंस राम को बसा रखा था उसी समानांतर आधार पर विष्णु के ह्वदय में संसार के पालन हेतु उत्तरदायित्व छिपा था। उस उत्तरदायित्व में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं हो इसलिए संभवतया लक्ष्मीजी का निवास वक्षस्थल बना।
एक बार धरती पर विश्व कल्याण हेतु यज्ञ का आयोजन किया गया। तब समस्या उठी कि यज्ञ का फल ब्रम्हा, विष्णु, महेश में से किसे अर्पित किया जाए। इनमें से सर्वाधिक उपयुक्त का चयन करने हेतु ऋषि भृगु को नियुक्त किया गया। भृगु ऋषि पहले ब्रम्हाजी और तत्पश्चात महेश के पास पहुंचे किन्तु उन्हें यज्ञ फल हेतु अनुपयुक्त पाया। अंत में वे विष्णुलोक पहुंचे। विष्णुजी शेष शय्या पर लेटे हुए थे और उनकी दृष्टि भृगु पर नहीं जा पाई। भृगु ऋषि ने आवेश में आकर विष्णु जी के वक्ष पर ठोकर मार दी। अपेक्षा के विपरीत विष्णु जी ने अत्यंत विनम्र होकर उनका पांव पक़ड लिया और नम्र वचन बोले- हे ऋषिवर! आपके कोमल पांव में चोट तो नहीं आई? विष्णुजी के व्यवहार से प्रसन्न भृगु ऋषि ने यज्ञफल का सर्वाधिक उपयुक्त पात्र विष्णुजी को घोषित किया। उस घटना की साक्षी विष्णुजी की पत्नी लक्ष्मीजी अत्यंत क्रुद्व हो गई कि विष्णुजी का वक्ष स्थान तो उनका निवास स्थान है और वहां धरतीवासी भृगु को ठोकर लगाने का किसने अधिकार दिया? उन्हें विष्णुजी पर भी क्रोध आया कि उन्होंने भृगु को दंडित करने की अपेक्षा उनसे उल्टी क्षमा क्यों मांगी? परिणामस्वरूप लक्ष्मीजी विष्णुजी को त्याग कर चली गई। विष्णुजी ने उन्हें बहुत ढूंढा किन्तु वे नहीं मिलीं।
अंतत: विष्णुजी ने लक्ष्मी को ढूंढते हुए धरती पर श्रीनिवास के नाम से जन्म लिया और संयोग से लक्ष्मी ने भी पद्मावती के रूप में जन्म लिया। घटनाचक्र ने उन दोनों का अंतत: परस्पर विवाह करवा दिया। सब देवताओं ने इस विवाह में भाग लिया और भृगु ऋषि ने आकर एक ओर लक्ष्मीजी से क्षमा मांगी तो साथ ही उन दोनों को आशीर्वाद प्रदान किया।
लक्ष्मीजी ने भृगु ऋषि को क्षमा कर दिया किन्तु इस विवाह के अवसर पर एक अनहोनी घटना हुई। विवाह के उपलक्ष्य में लक्ष्मीजी को भेंट करने हेतु विष्णुजी ने कुबेर से धन उधार लिया जिसे वे कलियुग के समापन तक ब्याज सहित चुका देंगे। ऐसी मानता है कि जब भी कोई भक्त तिरूपति बालाजी के दर्शनार्थ जाकर कुछ चढ़ाता है तो वह न केवल अपनी श्रद्धा भक्ति अथवा आर्त प्रार्थना प्रस्तुत करता है अपितु भगवान विष्णु के ऊपर कुबेर के ऋण को चुकाने में सहायता भी करता है। अत: विष्णुजी अपने ऐसे भक्त को खाली हाथ वापस नहीं जाने देते हैं।
जिस नगर में यह मंदिर बना है उसका नाम तिरूपति है और नगर की जिस पहाड़ी पर मंदिर बना है उसे तिरूमला (श्री+मलय) कहते हैं। तिरूमला को वैंकट पहाड़ी अथवा शेषांचलम भी कहा जाता है। यह पहड़ी सर्पाकार प्रतीत होती हैं जिसके सात चोटियां हैं जो आदि शेष के फनों की प्रतीक मानी जाती हैं। इन सात चोटियों के नाम क्रमश: शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरू़डाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि और वैंकटाद्रि हैं।


